24 जनवरी 2009

नमस्कार, स्वागत है आपका.

''पिछले आलेख में मैंने जर्नलिज्म को सोसाइटी का साईट कहा तो कई लोगों ने मुझे टिपण्णी द्वारा मीडिया को ही मिरर दिखाने की नेक सलाह दी। इसलिए मैंने उन सभी बहन-बंधुओं के लिए मीडिया का एक दूसरा चेहरा सामने लाने का प्रयास किया है।''

बाज़ार की दुनिया में हर तरफ़ पैसों की मारामारी मची हुई है। रोज़ नए अख़बार के बाज़ार में छपने की ख़बर मिलती है, तो रोज़ नए न्यूज़ चैनल रिमोट के बटन दबाते ही अपना परिचय देने लगते हैं। अब दूरदर्शन के दर्शन कभी-कभी ही हो पता है।

बाज़ार की मजबूती ने समाचार के बाज़ार को आंधीनुमा हवा दी, जिससे अख़बार, जर्नल, मैगजीन और न्यूज़ चैनल की बाढ़ सी आ गई है। पुराने पत्रकार व्यापार में कूद पड़े और बन गए सबसे बड़े पत्रकार।
स्ट्रगलर पत्रकार सोचते थे कि जैसे-जैसे न्यूज़ चैनलों की संख्या बढेगी ज़्यादा से ज़्यादा पत्रकारों को नौकरी मिलेगी। मोटी सैलरी मिलेगी। नौकरी मिलने के पैमाने बनेंगे और निकाले जाने के भी वजह बताये जायेंगे। अच्छी पत्रकारिता होगी, जिससे समाज और देश का भला होगा। पर सब बेकार सोचते थे। छोटे और स्ट्रगलर पत्रकारों की सोच फटीचर निकली।
पत्रकार व्यापार करने लगे और भ्रष्टाचार चैनलों की पहचान बन गई है। पैसे लेकर न्यूज़ दबाना और ब्लैकमेलिंग के लिए फूटेज का इस्तेमाल, जाल की तरह चैनलों को जकड चुका है। और भी ज़्यादा असुरक्षित हो गई स्ट्रगलर पत्रकारों की नौकरी। हमेशा डर सताने लगा कि कब, किस गली में नौकरी की शाम हो जाए, वो भी बिना बताये।

न नौकरी मिलने के पैमाने बने न निकाले जाने की वजह। तनख्वाह अल्लाह के नाम की खैरात और काम, मजदूर सरीखे। न पटकथा में मर्ज़ी चलती है और न रिपोर्टिंग में। सब कुछ आदेश की टेढी आँख पर। नही माने तो हो गई ऊँगली, अब भटकते रहिये चैनलों की दर-ब-दर, कोई पूछने वाला नही। सबके सब फ़िल्म सिटी में इंडिया टीवी के पीछे चाय की दूकान पर रेज़िउम हाथ में लिए किसी पैरवी की जुगाड़ में रहते हैं कि काश कोई इंटरव्यू करा दे। चैनल की गेट पर टकटकी लगाये आँख फाड़ कर कैपरी और छोटे टॉप में मोबाईल पर गपियाते लड़कियों को निहारते रहते हैं। कतारों में खड़ी लम्बी-लम्बी कारों के शीशे पर लगी चैनल की स्टीकर दिलो-दिमाग में खलबली मचा देती है।

पर सच्चाई कुछ और है। सब की पतलून फटी मिलेगी अगर पीछे मुड़ कर देखें तो। जाहिर है फटेगा ही, रंगीन न्यूज़ रूम में बॉस की सिगरेट की बदबूदार आवाज़ में हर पल वही धमकी सुनाई देती है'' नौकरी से निकाल दिए जाओगे'', ''काम पे ध्यान दो, लौंडियाबाज़ी कम करो'', ''ज़ल्दी आओ देर से जाओ'', ''काम करो पैसा मत देखो'', ''जितना कहा जाता है उतना करो''।
पत्रकारिता की तो ऐसी की तैसी हो चुकी है, अब इंसानियत की भी सौदेबाजी होने लगी है। लड़कियां तो अपनी मर्ज़ी या ऊपर वाले की अर्जी पर ही काम करतीं हैं, पर लड़के भी सुरक्षित नही रहे। उन्हें भी कीमत देनी पड़ती है कैमरे की लेंस में आने के लिए।

गुटबाजी और राजनीति ऐसी की ओबामा के भी पसीने छुडा दे। चमचों की बल्ले-बल्ले और इमानदारों की खैर नही। कुल मिला कर देखें तो, इस बाजारवाद ने समाचार को व्यापार बना दिया है, जहाँ न इंसानियत बची है न एथिक्स की बातें बची है। सिर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा पैसा और टीआरपी कमाने के लिए दिन में दो बार मीटिंग होती है। और रोज़ स्ट्रगलर पत्रकारों को हासिये पर लटकाया जाता है। टीवी स्क्रीन पर ''नमस्कार स्वागत है आपका'' बोलने वाले खूबसूरत चेहरे की मन की बात मन ही में रह जाती है। काश वो भी कभी स्क्रीन पर आ पाती।

10 टिप्‍पणियां:

Meenakshi Kandwal ने कहा…

मीडिया में सात-आठ महीने बिता चुकी हूं। और इस लेख के एक एक शब्द में इन सात-आठ महीनों के अतीत को किसी शार्ट फिल्म की तरह दोहरा दिया। सच सचमुच में बहुत कड़वा हैं लेकिन उससे भी बड़ा दुर्भाग्य ये है कि सबकुछ जानते हुए भी इस बाबत कुछ किया जाना........
ख़ैर वक्त भी बदलता है, हालात भी बदलते हैं और सिस्टम भी बदलता है। तो उसी बदलाव के लिए कदम उठाते हैं....
शुभकामनाएं

अखिलेश सिंह ने कहा…

पेशेवर हो चुकी मीडिया अब बहुत बड़ी मंडी में तब्दील हो चुका है इसका एहसास तब होता है जब कोई मास -कॉम करके बड़े ही उम्मीदों के साथ किसी मीडिया हॉउस की ओर नौकरी की आश में रुख करता है, स्ट्रगलर होना मानो मीडिया में सबसे बड़ा गुनाह है, लोग यहाँ पत्रकारिता करने का ज़ज्बा नही देखते किसी बड़े नाम की पैरवी काम आती है, जिसकी पैरवी है काम मिलेगी जिसका कोई माई-बाप नही जिन्दगी भर स्ट्रगलर ही बना रहेगा .
आप का लिखा आलेख लगता है कहीं ना कहीं हर स्ट्रगलर की कहानी है....

kundan ने कहा…

बॉलीवुड ने एक शब्द दिया कास्टिंग काउच!मीडिया ने अभी तक कोई नाम नहीं दिया!पर हालत कुछ ऐसा ही है!आपका लेख पढ़ कर कभी महसूस ये होता है पत्कारिता को बचने के लिए हमें ५ वे स्तम्भ की स्तापना करनी होगी!जरुरत हैं हमें आप जैसे लोगो की बोलने और लिखने से आगे बढिए हम साथ है !

prabhat ने कहा…

मै भी आजकल पत्रकारिता के क्षेत्र में हाथ आजमाने की सोच रहा हूँ, पर आपके इस लेख ने मुझे फिर से अपने कदम को पीछे खीचने के लिये सोचने पर मजबूर कर दिया है. आपका लेख नए पत्रकारों को सही रास्ता दिखायेगा. बधाई.

Surendra ने कहा…

सही कहा है आपने राजीव. मीडिया को मिरर दिखाने के लिये बधाई.

संदीप द्विवेदी ने कहा…

अभी तक मैं मीडिया हाउस में चलने वाली राजनीती से अछूता था लेकिन पिछले दिनों घटी एक घटना ने मेरी आँखे खोल दी.....दरअसल मेरे सर के चमचे ने मेरे हिस्से की रोटी मर ली और मेरी रिपोर्टिंग कर आया....बिल्कुल सुच कहा है आपने यहाँ तो नेकी कर दरया में डूब वाली कहावत लागु होती है.....किसी ने बिल्कुल सच कहा है की मीडिया में रहना है तो मुतो कम हिलाओ ज़्यादा......भाई साहब अब मैं भी मीडिया के रंग में रंगने जा रहा हूँ......मुझे माफ़ कीजिये.......

बेनामी ने कहा…

जाओ संदीप तुम्हे माफ़ किया......मीडिया के रंग में पूरी तरह रंग जाना फिर भी कुछ ना कर सको तो चुलू भर पानी का सहारा ले लेना
लड़ना सीखो हिलाना नही

dheeraj ने कहा…

लोग कुछ भी सोचे या कुछ भी देखे लेकिन हकीकत यह है कि खबर दूरदशॆन के नजरिये से ही देखना चाहिए । मै तो अभी तक यही कर रहा हू । वैसे आपका यह पोस्ट अच्छा है । धन्यवाद

समीर सृज़न ने कहा…

bahut sahi likha hai aapne

समीर सृज़न ने कहा…

keep it up, thanks